अडल्ट्री कानून: बदले बदले सरकार नजर आते हैं, घर की बर्बादी के आसार नजर आते हैं

एक पुरानी कहावत है- ‘देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जी (जीव)’, मगर यहां बात रूखी-सूखी रोटी की नहीं बल्कि पत्नी की हो रही है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले से पति परमेश्वर की गुलामी से निजात दिला दी है! जाने कब से अपनी अकल और दूसरे की ब्याहता सर्वश्रेष्ठ समझने वालों की कमी नहीं रही है। इसीलिए शादी के बाद परपुरुष के साथ रमण को पाप ही नहीं, अपराध भी समझा जाता रहा है। बाइबिल में जो दस महा आदेश (कमांडमेंट) दर्ज हैं, उनमें एक अडल्ट्री को गर्हित वर्जित आचरण में शुमार करता है। हिंदू परंपरा में पातिव्रत धर्म की बड़ी महिमा है पर ईसाई और मुसलमान, यहूदी आदि भी इस ‘दुराचरण’ को दंडनीय अपराध मानते रहे हैं।

विडंबना यह है कि आला अदालत के इस फैसले तक इस जुर्म की शिकायत सिर्फ आहत पति या पत्नी ही कर सकते थे। बाकी हाल वही था- ‘जब मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी?’ वैसे हकीकत यह थी कि बेचारी पत्नी या पति कुछ भी करने में असमर्थ रहते थे अगर उनके जीवनसाथी को किसी ताकतवर प्रेमी ने रिझा लिया हो। ‘मेरी बीबी को उसके प्रेमी से बचाओ!’ की गुहार लगाने के अलावा वह कर भी क्या सकते थे? भारत के मिथकों पुराणों में ऐसे आख्यानों का अभाव नहीं जिनमें दंड निर्दोष छली गई पत्नी को ही दिया जाता है। इंद्र जब पति का रूप धर अहिल्या को भ्रमित कर सहचरी बनाता है, ऐसा ही प्रसंग है।जाहिर है कि अब तक अंधे कानून का पलड़ा पुरुष की तरफ ही झुका था और स्त्रियों के समानता के अधिकार का हनन होता था, पर क्या सुप्रीम कोर्ट की इस दहाड़ से पलक झपकते उनके अच्छे दिन आ जाएंगे? फैसले में साफ कहा गया है कि पत्नी के शरीर पर पति का मालिकाना हक नहीं। सरकार की यह दलील खारिज कर दी गई कि इस ‘दुराचरण’ को दंडनीय जुर्म नहीं रखा गया तो ‘विवाह की पवित्र संस्था’ खतरे में पड़ जाएगी। विवाह सभी धर्मों में इसे पवित्र बंधन नहीं, एक करार अनुबंध समझा जाता है। यह तर्क धर्मनिरपेक्ष समाज में अकाट्य नहीं समझा जा सकता। इसके साथ-साथ यह जोड़ने की जरूरत है कि एक तरक्की पसंद अदालती फैसले से पितृसत्तात्मक संस्कारों की दकियानूस बेड़ियां ख़ुद ब ख़ुद नहीं टूटने वाली। जिस तरह वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अब भारत में जुर्म नहीं माना जाता, उसी तरह विवाहेतर शारीरिक संबंध अब निजता के बुनियादी अधिकार के सुरक्षा कवच का संरक्षण प्राप्त कर चुके हैं।

 

‘दगा-दगा, वई-वई’ की मीठी खुजली जो फिसलन भरी पगडंडी तक पहुंचा देती है। इस प्रलोभन से बचने में ही भलाई नजर आती हैं। जितना खुजाएंगे दाद उतना बढ़ेगा। तसल्ली कहां होती है? शादी के साथ सेक्स अभिन्न रूप से जुड़ा है और यह कहना मुश्किल है कि इस मिठाई या चाट को मिल बांट कर खाया पचाया जा सकता है।तलाक के लिए अभी भी परपत्नी या परपुरुष गमन को आधार बनाया जा सकता है। जब ऐसे मुकदमे अदालत के सामने आएंगे तब निजता का हनन नहीं होगा क्या? अदालत का यह कहना ठीक है कि अविवाहित या विधवा और विधुर के साथ विवाहेतर शारीरिक संबंध अगर अपराध नहीं तो फिर बदफैली (कुकर्मी) के ही साथ नाइंसाफी क्यों।  मगर क्या यह विवाह के साथ जुड़े संतान और उत्तराधिकार के कानून, आजाद मिजाज के खुले रिश्तों को कबूल करने के बाद अक्षत रहेंगे? बदले बदले हमें सरकार नजर आते हैं, घर की बर्बादी के आसार नजर आते हैं! Copyright

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