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bachapan ki yaande , कास  हम बच्चे ही होते ,

bachapan ki yaande , कास  हम बच्चे ही होते ,

कास  हम बच्चे ही होते , कितना अच्छा होता ना ना ही किसी मंदिर के लिये लडते ना ही मस्जिद मे लिये साथ मे खेलते और फिर घर जकर सो जाते । बचपन मे हमे बस स्कूल और खेल का मैदान चाहिये , और जब हम बडे होते है तो हमारे अंदर एक लालच पैदा हो जाता है चान्हे ओ पैसे के लिये हो या फिर धर्म के लिये , कभी हम धर्म के लिये लडते है तो कभी पैसे के लिये , फिर पैसो ले लिये कन्हीअपनो से दुर निकल जाते है , मॉ – बाप और भाई बहन दोस्त सब दुर हो जाते है हा हम जन्हा जाते है वहा6व एक नया दोस्त तो मिल जाते है पर ओ बचपन जैसे नही ।




 

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बचपन यांदो मे एक छोटा सा कविता लिखा रहा हू अगर पसंद आये तो शेयर और लाईक  करियेगा

याद आया मुझको बचपन अपना वो प्यारा घर ,और छोटा सपना

गांव की गलियां प्यारी थी

मम्मी की गोदी न्यारी थी

सुबह जब उठ कर मंजन करते

खाने में हम नहीं थे डरते

स्कूलों की याद थी आती

टीचर की भी मार सताती

खेल खेल में जब हम लड़ते

कट्टी ओट्टी सब थे करते

याद आया मुझको बचपन अपना वो प्यारा, घर और छोटा सपना

इज्जत हम को बड़ी थी प्यारी

लेकिन बेज्जती हम पे भारी

अधिकारों का भरार्पड करना

ये था पुराना आदत अपना

सेल्फी के हम बड़े थे प्यारे

डाँट भी खाते न्यारे न्यारे

मामी मौसी हमे बताती

बैठ किनारे वो समझाती

याद आया मुझको बचपन अपना

वो प्यारा, घर और छोटा सपना

हम भी छोटे बच्चे थे

मन के बिल्कुल सच्चे थे

छोटे छोटे सपनें थे

बचपन में सारे अपने थे

बरसातों में नाव चलाते

आसमानों में जहाज उड़ाते

घर की जब सीढ़ी चढ़ते थे

दिन में कई बार फिसलते थे

याद आया मुझको बचपन अपना

वो प्यारा, घर और छोटा सपना


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